मां देवकी की गोद में बाल-कृष्ण : जब भी हम गोवा का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में चमचमाते समंदर के किनारे, खूबसूरत बीचेस और पुर्तगाली दौर के पुराने चर्च घूम जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी गोवा में भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का एक ऐसा दुर्लभ हीरा छिपा हुआ है, जो पूरे विश्व में कहीं और देखने को नहीं मिलता?
जी हाँ, श्री कृष्ण जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर जहाँ पूरे देश के मंदिरों में लल्ला के जन्मोत्सव की धूम रहती है, वहीं गोवा के मार्सेल (Mashel) गाँव में एक ऐसा मंदिर स्थित है जहाँ भगवान कृष्ण अकेले नहीं, बल्कि अपनी सगी माता देवकी के साथ पूजे जाते हैं। पूरे भारत में यह एकमात्र ऐसा पावन धाम है जहाँ मां देवकी की गोद में बाल-कृष्ण की अति मनमोहक मूर्ति स्थापित है।
आइए, जन्माष्टमी 2026 के इस खास मौके पर इस अद्भुत मंदिर के इतिहास, इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा और पुर्तगालियों के अत्याचार से लेकर इसके पुनर्निर्माण की अनोखी कहानी को विस्तार से जानते हैं।
मां देवकी की गोद में बाल-कृष्ण : क्यों खास है मार्सेल का ‘देवकी-कृष्ण संस्थान’?
आमतौर पर भारतभर के श्री कृष्ण मंदिरों में कान्हा या तो राधा रानी के साथ विराजते हैं, या फिर रुक्मिणी जी के साथ। मथुरा-वृंदावन में माखनचोर के साथ यशोदा मैया की छवियां तो बहुत देखने को मिलती हैं, लेकिन भगवान कृष्ण को जन्म देने वाली उनकी सगी मां देवकी के साथ उनकी पूजा का विधान बहुत दुर्लभ माना गया है।
गोवा के पोंडा तालुका के अंतर्गत आने वाले मार्सेल गाँव का ‘देवकी-कृष्ण संस्थान’ (Shree Devakikrishna Ravalnath Saunsthan) इस मामले में अद्वितीय है।
इस मंदिर के गर्भगृह में काले संगमरमर पत्थर से तराशी गई मां देवकी की एक बेहद भव्य और खड़ी प्रतिमा स्थापित है। मां देवकी के दोनों पैरों के बीच उनकी गोद में नन्हे बाल-कृष्ण बेहद प्यार से खड़े हैं। इस प्रतिमा को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो मां अपने लल्ला को बहुत जतन से दुलार रही हों।
पौराणिक कथा: जब कंस के डर के बाद पहली बार मिले मां और बेटे
इस अनोखी मूर्ति के पीछे एक बेहद भावुक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान श्री कृष्ण का जन्म कंस के कारागार में हुआ, तो वासुदेव जी उन्हें रातों-रात गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के घर छोड़ आए थे। इस वजह से मां देवकी को अपने पुत्र के बाल-रूप का सुख देखने को नहीं मिला था।
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जरासंध का आक्रमण और गोमंचल पर्वत: जब जरासंध ने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किया, तो श्रीकृष्ण और बलराम गोमंचल पर्वत (वर्तमान में गोवा का क्षेत्र) की ओर आए थे।
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मां देवकी की व्याकुलता: अपने पुत्र से लंबे समय तक दूर रहने के कारण मां देवकी व्याकुल होकर गोमंचल पर्वत के घने जंगलों में श्रीकृष्ण की तलाश में पहुँचीं।
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पहचान न पाने का भ्रम: कई वर्षों बाद जब मां देवकी ने विशाल और प्रतापी कृष्ण को देखा, तो वह उन्हें पहचान नहीं सकीं और सोचने लगीं कि कहीं यह कोई मायावी राक्षस तो नहीं।
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बाल-रूप धारण करना: अपनी माता के संशय और वात्सल्य को समझते ही भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंत अपना वही नटखट बाल-रूप धारण कर लिया। इसके बाद वह दौड़कर मां देवकी की गोद में जाकर बैठ गए।
गोवा का यह मंदिर इसी अलौकिक मिलन के उस ऐतिहासिक क्षण का प्रतीक माना जाता है।
इतिहास का दौर: पुर्तगालियों के आतंक से कैसे बची यह अलौकिक मूर्ति?
देवकी-कृष्ण मंदिर का इतिहास सिर्फ आस्था का ही नहीं, बल्कि भारी संघर्ष और सनातन संस्कृति की रक्षा की बेमिसाल मिसाल भी है।
| समय / वर्ष | ऐतिहासिक घटनाक्रम |
| प्राचीन काल | मंदिर मूल रूप से गोवा के ‘चूड़ामणि द्वीप’ (आज का चोराव या चोड़न द्वीप) पर स्थापित था। |
| 16वीं सदी (1510-1540) | पुर्तगालियों ने गोवा पर कब्जा किया और हिंदू मंदिरों का बड़े पैमाने पर विनाश शुरू हुआ। |
| मंदिर का स्थानांतरण | भक्तों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मूर्ति को नांवों के जरिए बिचोलिम के मायेम गाँव पहुँचाया। |
| वर्ष 1560 के करीब | अंततः देवकी-कृष्ण की पावन मूर्ति को मार्सेल गाँव में सुरक्षित लाकर पुनः स्थापित किया गया। |
जब 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली शासकों ने गोवा में धर्म परिवर्तन और मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलाया, तब सारस्वत ब्राह्मणों और स्थानीय ग्रामीणों ने रातों-रात देवकी-कृष्ण की इस पवित्र मूर्ति को एक छोटी सी नौका में छिपाकर कुंभरजुआ नहर के रास्ते सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया था। वर्षों तक भटकने के बाद अंततः इसे मार्सेल के शांत वातावरण में स्थापित किया गया, जहाँ यह आज भी सुरक्षित है।
जन्माष्टमी पर यहाँ का माहौल क्यों होता है खास?
यूं तो पूरे साल देश-विदेश से भक्त इस अनोखी मूर्ति के दर्शन के लिए मार्सेल पहुँचते हैं, लेकिन Janmashtami 2026 पर यहाँ का नजारा ही अलग होता है।
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शिबिकोत्सव (Shibikotsav): इस मंदिर में एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जिसे शिबिकोत्सव कहा जाता है। इस दौरान भगवान कृष्ण को मां की गोद में विराजमान कराकर पालकी यात्रा निकाली जाती है।
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तुलसी की लकड़ी से बना रथ: मंदिर का एक विशेष रथ काली तुलसी की लकड़ी से बना है, जिस पर जब कान्हा विराजते हैं, तो उनकी शोभा देखते ही बनती है।
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महाअभिषेक और झूलोत्सव: जन्माष्टमी की आधी रात को जब बाल-कृष्ण का जन्म होता है, तो पंचामृत से मां देवकी और कान्हा का अभिषेक किया जाता है। स्थानीय गंतव्य गीत और पारंपरिक कोंकणी भजनों से पूरा गाँव गूंज उठता है।
मार्सेल कैसे पहुँचे? (Travel Details for Devotees)
यदि आप इस जन्माष्टमी या गोवा ट्रिप के दौरान बीचेस के अलावा किसी अलौकिक आध्यात्मिक अनुभव की तलाश में हैं, तो देवकी-कृष्ण मंदिर जरूर जाएं।
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स्थान: मार्सेल (Mashel) गाँव, पोंडा तालुका, गोवा।
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दूरी: यह मंदिर गोवा की राजधानी पणजी से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित है।
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निकटतम रेलवे स्टेशन: करमली (Karmali Railway Station) और मडगाँव (Madgaon) निकटतम स्टेशन हैं।
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समय: मंदिर सुबह 6:00 बजे से रात 8:30 बजे तक भक्तों के लिए खुला रहता है।
निष्कर्ष: वात्सल्य और भक्ति का अनूठा संगम
गोवा का यह ऐतिहासिक देवकी-कृष्ण मंदिर हमें यह याद दिलाता है कि सनातन धर्म में मां और संतान के रिश्ते को कितना पवित्र और सर्वोपरि माना गया है। जहाँ एक तरफ दुनिया कृष्ण को उनके नटखट रूप या कुरुक्षेत्र के उपदेशक के रूप में पूजती है, वहीं गोवा का यह धाम मां के आंचल में छिपे उस बाल-कृष्ण की याद दिलाता है जो केवल प्रेम और वात्सल्य के भूखे हैं।
अगर आप भी इस बार अपनी जन्माष्टमी को यादगार बनाना चाहते हैं, तो मां देवकी की गोद में बाल-कृष्ण के इस अलौकिक रूप के दर्शन का संकल्प जरूर लें।

