Dhurandhar Runtime : ने पूरे देश में तहलका मचा रखा है। रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना और आर. माधवन जैसे धुरंधरों से सजी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो खूब कमाई कर रही है, लेकिन एक चीज़ है जो दर्शकों के बीच बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है—और वह है इसका रनटाइम। जी हाँ, 3 घंटे 34 मिनट की यह फिल्म पिछले 17 सालों में बॉलीवुड की सबसे लंबी फिल्मों में से एक है।
जब दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकल रहे हैं, तो दो तरह की बातें सामने आ रही हैं: एक तबका कह रहा है कि दमदार कहानी के सामने समय का पता ही नहीं चला, वहीं दूसरा तबका सवाल उठा रहा है कि क्या आज के ‘फ़ास्ट-फॉरवर्ड’ ज़माने में दर्शकों के धैर्य की इतनी लंबी परीक्षा लेना सही है?
आज के इस वायरल ब्लॉग में, हम इसी सवाल की गहराई में जाएंगे। हम समझेंगे कि Dुरंधर रनटाइम के पीछे डायरेक्टर #AdityaDhar की क्या रणनीति रही होगी, और बॉलीवुड में कब-कब लंबे रनटाइम ने फिल्मों को या तो सुपरहिट बना दिया, या फिर बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरा दिया। यह लेख केवल फिल्म की समीक्षा नहीं है, बल्कि यह उस रचनात्मक स्वतंत्रता और मार्केटिंग की चाल का विश्लेषण है जो बड़ी फिल्मों को ‘ऐतिहासिक’ बनाने के लिए अपनाई जाती है।
Dhurandhar Runtime: क्यों बना 3.5 घंटे का रनटाइम चर्चा का विषय?
रणवीर सिंह स्टारर धुरंधर की कहानी, जैसा कि हम जानते हैं, पाकिस्तान के कराची स्थित ल्यारी गैंगवार (Operation Lyari) और आतंकवाद के बीच जटिल गठजोड़ पर आधारित है। डायरेक्टर आदित्य धर, जिन्होंने इससे पहले ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी सफल फिल्म दी है, इस बार पाकिस्तान के अंदरूनी अपराध और भारत विरोधी मंसूबों को बड़े पर्दे पर पूरी गहराई से उतारना चाहते थे।
एक साधारण स्पाई-एक्शन थ्रिलर से अलग, धुरंधर एक ‘एपिक’ या ‘ऐतिहासिक’ स्वरूप लेने की कोशिश करती है। फिल्म में कई परतें हैं:
- पात्रों का विस्तृत चित्रण: संजय दत्त का एसएसपी चौधरी असलम से लेकर अक्षय खन्ना का खतरनाक रहमान डकैत और अर्जुन रामपाल का menacing मेजर इकबाल—हर किरदार को अपना समय चाहिए।
- जटिल राजनीतिक पृष्ठभूमि: कहानी सिर्फ गोलीबारी नहीं है, बल्कि यह एक गुप्त ऑपरेशन, जासूसी, और भारत-पाकिस्तान के बीच की लंबी साजिश को दर्शाती है।
जब कहानी इतनी बड़ी और जटिल हो, तो फिल्ममेकर अक्सर रचनात्मक स्वतंत्रता (Creative Freedom) का सहारा लेते हैं। उन्हें लगता है कि 2 घंटे या ढाई घंटे में वे कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। यहीं पर Dhurandhar Runtime 214 मिनट (3 घंटे 34 मिनट) पर पहुँच जाता है। यह लंबाई, जो 2008 की ‘जोधा अकबर’ के बाद शायद सबसे बड़ी बॉलीवुड मेनस्ट्रीम रिलीज़ है, दर्शकों को दो इंटरवल तक बाँधकर रखने का एक जोखिम भरा दाँव है।
की-पॉइंट्स
- रनटाइम: 3 घंटे 34 मिनट।
- मकसद: Operation Lyari की जटिलता को विस्तार से दिखाना।
- परिणाम: दर्शकों का धैर्य परीक्षा पर।
Gen Z Vs Dhurandhar Runtime: धैर्य की परीक्षा और OTT का असर
आज का दर्शक बदल गया है। #Bollywood में अब वह दौर नहीं रहा जब लोग हर शुक्रवार 4 घंटे की फिल्म देखने के लिए उत्सुक रहते थे। ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों की आदत को बदल दिया है। आज लोग 30 मिनट के एपिसोड या ज्यादा से ज्यादा 2 घंटे की फिल्म देखना पसंद करते हैं।
ऐसे में, धुरंधर रनटाइम का 3.5 घंटे होना एक बहुत बड़ा जुआ है, खासकर जेन ज़ी (Gen Z) के लिए, जिनका अटेंशन स्पैन (Attention Span) अब बहुत कम हो गया है।
टीवी9 हिंदी के लेख के अनुसार, बहुत से दर्शक मानते हैं कि फिल्म की लंबाई औचित्य से परे है। डायरेक्टर आदित्य धर ने कुछ एक्शन और वायलेंस वाले दृश्यों को बेवजह लंबा खींच दिया है, सिर्फ इसलिए कि वह ‘ग्रैंड’ दिख सके।
एक कड़वा सच
फिल्म का एक गाना ‘रंभा हो हो हो’ जब बैकग्राउंड में बजता है, और उसी समय वायलेंस के लंबे सीन चल रहे होते हैं, तो यह दर्शकों को बांधे रखने के बजाय ऊब (Boredom) पैदा कर सकता है। फिल्म समीक्षकों ने भी इस बात पर सवाल उठाया है कि कुछ दृश्यों को छोटा किया जा सकता था, लेकिन ऐतिहासिक बनाने की धुन में डायरेक्टर ने शायद संपादन (Editing) पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
सवाल यह है: क्या लंबी फिल्म बनाना रचनात्मक स्वतंत्रता है, या दर्शकों को बोर करने का जोखिम? इसका जवाब बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की अंतिम सफलता पर निर्भर करेगा, क्योंकि आजकल हर दर्शक #DhairyakaImtihan नहीं देना चाहता।
ऐतिहासिक बनाने की रणनीति: Dhurandhar Runtime के पीछे आदित्य धर का इरादा
किसी भी फिल्ममेकर का अपनी फिल्म को अपेक्षा से ज़्यादा लंबा बनाने का एकमात्र इरादा अक्सर उसे ‘यादगार’ या ‘ऐतिहासिक’ बनाना होता है। जब कोई फिल्म अपनी कहानी या तकनीक के अलावा अपनी लंबाई के लिए भी जानी जाती है, तो वह अपने आप ही सुर्खियों में आ जाती है।
Dhurandhar Runtime के मामले में भी यह रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। आदित्य धर का लक्ष्य शायद सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर हिट होना नहीं था, बल्कि एक ऐसी फिल्म बनाना था जो भारत-पाकिस्तान के इतिहास, जासूसी, और राष्ट्रीय भावना की गाथा को संपूर्णता के साथ दिखाए।
रणनीति के मुख्य स्तंभ
- कथानक की गहराई: Operation Lyari की जटिलता, कई सारे पात्रों के बैकस्टोरी और युद्ध के विस्तृत चित्रण को ढाई घंटे में समेटना असंभव था।
- हाई-लेवल देशभक्ति: बड़े संवाद (धुआंधार डायलॉग) और ग्राफिक वायलेंस को पर्याप्त समय दिया गया ताकि देशभक्ति का जोश ‘हाई’ रहे।
- विरासत की इच्छा: इतिहास गवाह है कि कई सुपरहिट फिल्में लंबी थीं। फिल्ममेकर शायद मानते हैं कि अगर कहानी में दम है, तो दर्शक 3.5 घंटे क्या, 4 घंटे भी बैठेंगे।
यह रणनीति बताती है कि #Dhurandhar को एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सिनेमाई अनुभव (Cinematic Experience) के तौर पर प्रस्तुत किया गया है, जिसके लिए दर्शकों को ‘समय’ का त्याग करना पड़ेगा।
कथानक ही ‘धुरंधर रनटाइम’ की गारंटी: जब लंबाई बनी सफलता की सीढ़ी
क्या हर लंबी फिल्म असफल होती है? बिल्कुल नहीं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई फिल्में हैं, जिनकी लंबाई ने उन्हें और भी दमदार बना दिया। ये फिल्में साबित करती हैं कि जब कथानक (Narrative) मजबूत होता है, तो लंबाई कोई मायने नहीं रखती।
वो धुरंधर फिल्में, जिनका रनटाइम भी था ‘धुरंधर’
| फिल्म का नाम | रनटाइम (लगभग) | नतीजा | रणनीति की सफलता का कारण |
| लगान (Lagaan) | 3 घंटे 44 मिनट | ब्लॉकबस्टर | क्रिकेट और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की भावनात्मक कहानी को विस्तार से कहने की आवश्यकता। |
| मोहब्बतें (Mohabbatein) | 3 घंटे 36 मिनट | ब्लॉकबस्टर | अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के बीच प्यार और अनुशासन के टकराव को दर्शाने के लिए लंबी गानों और ड्रामा की ज़रूरत। |
| कभी खुशी कभी गम (K3G) | 3 घंटे 30 मिनट | ब्लॉकबस्टर | पारिवारिक मूल्यों, गानों, और बड़े पैमाने के ड्रामा को दर्शकों के सामने रखने के लिए। |
| जोधा अकबर (Jodhaa Akbar) | 3 घंटे 34 मिनट | सुपरहिट | ऐतिहासिक प्रेम कहानी और भव्य सेटिंग्स को विस्तृत रूप से फिल्माने के लिए। |
| गैंग्स ऑफ वासेपुर (GoW) | 5 घंटे 19 मिनट (दो भागों में) | कल्ट क्लासिक | अनुराग कश्यप की जटिल बदला और गैंगवार की कहानी को दो पीढ़ियों में बाँटने के लिए। |
उपरोक्त फिल्में यह दर्शाती हैं कि जब डायरेक्टर अपने विषय के प्रति पूरी तरह से समर्पित होते हैं और कहानी वास्तव में 3.5 घंटे की मांग करती है, तो दर्शक अपनी घड़ी देखना भूल जाते हैं। Dhurandhar Runtime को अगर इन फिल्मों की श्रेणी में आना है, तो इसका सबसे बड़ा परीक्षण दर्शकों का मुंह से प्रचार (Word of Mouth) ही होगा।
विफलता का डर: जब लंबाई ने डुबोई बड़े सितारों की फिल्में
लंबे रनटाइम की रणनीति हमेशा सफल नहीं होती। कई बार, फिल्ममेकर यह भूल जाते हैं कि सिर्फ लंबाई से फिल्म ‘ग्रैंड’ नहीं बन जाती। अगर कहानी में दम नहीं है या संपादन ढीला है, तो दर्शक तुरंत उसे नकार देते हैं।
वे फिल्में, जहाँ लंबाई साबित हुई बड़ी चूक
- मेरा नाम जोकर (Mera Naam Joker): राज कपूर की 1970 में आई यह फिल्म 4 घंटे 4 मिनट लंबी थी, जिसमें दो इंटरवल थे। यह फिल्म उस समय बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई थी, हालांकि बाद में इसे कल्ट क्लासिक माना गया।
- एलओसी कारगिल (LOC Kargil): 2003 में रिलीज़ हुई यह वॉर ड्रामा फिल्म 4 घंटे 15 मिनट लंबी थी, जो बॉलीवुड की सबसे लंबी फिल्मों में से एक है। बड़े स्टार्स होने के बावजूद, इसकी अत्यधिक लंबाई और धीमे पेस ने इसे बॉक्स ऑफिस पर निराशाजनक बना दिया।
- सलाम-ए-इश्क (Salaam-e-Ishq): 2007 में आई यह मल्टीस्टारर रोमांटिक ड्रामा भी 3 घंटे 36 मिनट लंबी थी। कई लव स्टोरीज को समेटने की कोशिश में यह फिल्म उलझ गई और फ्लॉप रही।
इन उदाहरणों से साफ है कि सिर्फ बड़ी स्टारकास्ट या भव्यता से काम नहीं चलता। अगर धुरंधर रनटाइम में ज़रूरत से ज़्यादा हिंसा, लंबे वायलेंस सीन, या अनावश्यक ड्रामे को जगह दी गई है, जैसा कि कुछ समीक्षक कह रहे हैं, तो यह फिल्म को ऐतिहासिक बनाने के बजाय उसे धीमा और उबाऊ बना सकता है।
रणवीर सिंह का दाँव और ‘धुरंधर रनटाइम’ का भविष्य
रणवीर सिंह ने हमेशा लीक से हटकर किरदार चुने हैं, और धुरंधर भी इसी कड़ी का हिस्सा है। उनकी कोशिश एक ऐसे किरदार को जीने की है, जिसके लिए विस्तार और गहराई ज़रूरी है।
डायरेक्टर आदित्य धर ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वह इस कहानी को अभी ख़त्म नहीं करने वाले। ख़बरें हैं कि जल्द ही धुरंधर 2 भी आने वाली है। यह इस बात का प्रमाण है कि #AdityaDhar इस पूरी कथा को एक विशाल ‘यूनिवर्स’ के तौर पर देख रहे हैं।
अगर Dhurandhar Runtime दर्शकों को बाँधने में कामयाब रहा है और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बजट से ऊपर निकल जाती है, तो यह बॉलीवुड में एक नया ट्रेंड सेट करेगा। यह ट्रेंड होगा—’बड़ी कहानी के लिए बड़ा समय’।
लेकिन अगर फिल्म का कलेक्शन अपने बजट के मुकाबले ठंडा रहता है, तो यह एक चेतावनी होगी कि दर्शकों को सिनेमाघर में 3.5 घंटे बिठाए रखने का ज़माना शायद अब गुज़र चुका है।
फिलहाल, #Dhurandhar ने बॉलीवुड को एक ज़रूरी बहस दे दी है: क्या रनटाइम पर सेंसरशिप लगाने की बजाय, फिल्ममेकर्स को दर्शक के धैर्य का सम्मान करना चाहिए?




