हेलो दोस्तों! जब भी हम किसी शादीब्याह, त्योहार या किसी खास फंक्शन के लिए एथनिक लुक (Ethnic look) तैयार करते हैं, तो पैरों में क्या पहनते हैं? जी हां, बिल्कुल सही अंदाज़ा लगायाकोल्हापुरी चप्पल! चाहे कुर्तापायजामा हो, जींसटीशर्ट हो या फिर खूबसूरत साड़ी, कोल्हापुरी चप्पल हर आउटफ़िट में चार चांद लगा देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आज आप बड़े चाव से अपने पैरों की शान बनाते हैं, उसका नाता राजामहाराजाओं और उनके शाही दरबारों से है?

आज हम आपको बताने जा रहे हैं कोल्हापुरी चप्पल का इतिहास, जो इतना दिलचस्प है कि आपके होश उड़ जाएंगे! तो चलिए, बिना किसी देरी के चलते हैं इतिहास के उस सफर पर जहां से इस नायाब कला की शुरुआत हुई थी।

12वीं सदी के शाही दरबार से शुरू हुआकोल्हापुरी चप्पल का इतिहास

अगर आपको लगता है कि कोल्हापुरी चप्पल कोई मॉडर्न ज़माने का अविष्कार है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। कोल्हापुरी चप्पल का इतिहास लगभग 800 साल पुराना है।

  • शुरुआती जड़ें: इसकी शुरुआत 12वीं सदी में कर्नाटक के राजा बिज्जला और उनके प्रधानमंत्री बसवन्ना के शासनकाल में हुई थी। उन्होंने स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देकर इस तरह के फुटवियर बनाने की शुरुआत करवाई थी।
  • कानों वाली चप्पल: 18वीं सदी मेंसौदागरनाम के एक कारीगर परिवार ने इस डिज़ाइन को और भी खूबसूरत और पतला रूप दिया। उस समय इसेकानवालीयानी कानों वाली चप्पल कहा जाता था क्योंकि इसके दोनों तरफ कान जैसे फ्लैप्स (Flaps) होते थे।
  • शाही संरक्षण: इसके बाद कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज (Chhatrapati Shahu Maharaj) ने इस कला को देखा और वे इसके दीवाने हो गए। उन्होंने न सिर्फ इसे खुद पहना, बल्कि कोल्हापुर में इसके बड़ेबड़े ट्रेनिंग सेंटर खुलवाए। राजारानी के इसी खास लगाव के कारण इसका नाम हमेशाहमेशा के लिएकोल्हापुरी चप्पलपड़ गया।

कभी 2 किलो की होती थी यह चप्पल, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप!

आज जो कोल्हापुरी चप्पलें आप बाजार में देखते हैं, वे बेहद हल्की और आरामदायक होती हैं। लेकिन पुराने समय में ऐसा बिल्कुल नहीं था।

एक हैरान करने वाला सच: शुरुआत में पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पल भैंस की मोटी चमड़ी (Buffalo hide) से बनाई जाती थी और इसका सोल (तली) इतना भारी होता था कि एक जोड़ी का वजन लगभग 2 किलोग्राम तक हो जाता था!

अब आप सोच रहे होंगे कि इतना भारी जूता कोई क्यों पहनेगा? दरअसल, उस ज़माने के राजाओं के सैनिक और स्थानीय लोग महाराष्ट्र के उबड़खाबड़ पत्थरों और गर्म पहाड़ी रास्तों पर चलते थे। इस चप्पल को इतना मजबूत इसलिए बनाया जाता था ताकि यह भीषण गर्मी, पानी और पथरीली ज़मीन को आसानी से झेल सके और बरसोंबरस खराब न हो।

कोल्हापुरी चप्पल बनाने का वो तरीका, जिसमें एक भी कील नहीं ठोंकी जाती!

दोस्तों, एक असली और ट्रेडिशनल कोल्हापुरी चप्पल की सबसे बड़ी खासियत जानते हैं क्या है? इसे बनाने में लोहे की एक भी कील (Nail) या किसी सिंथेटिक गोंद का इस्तेमाल नहीं किया जाता! जी हां, यह पूरी तरह सेइकोफ्रेंडली‘ (Eco-friendly) होती है। आइए जानते हैं इसे बनाने के स्टेप्स:

1.चमड़े की नैचुरल टैनिंग

भैंस या बकरी के चमड़े को हरड़ा (Myrobalan nuts) और बाबुल के पेड़ की छाल के पानी में करीब एक महीने तक भिगोकर रखा जाता है। इससे लेदर मजबूत और खुशबूदार बनता है।

2.हाथ से कटाई और शेपिंग

कारीगर बिना किसी मशीन के, सिर्फ अपने औजारों से पैरों के नाप के हिसाब से चमड़े को सोल और पट्टियों के आकार में काटते हैं।

3.सिलाई और बुनावट (Jodana)

चप्पल के ऊपरी हिस्से और नीचे के सोल को आपस में जोड़ने के लिए चमड़े के ही धागों या सूती मोम वाले धागों से बारीक हाथ की सिलाई की जाती है। कील का नामोनिशान नहीं होता!

4.तेल और डीज़ल का तड़का

चप्पल को उसका खास गहरा भूरा या डार्क टैन रंग देने के लिए और चमड़े की सिलवटें हटाने के लिए इसे खास तेल या कभीकभी डीज़ल के घोल में डुबाया जाता है।

सेहत के लिए वरदान है यह चप्पल!

क्या आपको पता है कि कोल्हापुरी चप्पल का इतिहास सिर्फ फैशन से नहीं, बल्कि सेहत से भी जुड़ा है? पुराने ज़माने में लोग इसे डॉक्टर की सलाह पर भी पहनते थे।

  • पैरों को रखे ठंडा: चूंकि यह पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से तैयार लेदर से बनती है, इसलिए यह पैरों की गर्मी को सोख लेती है। इसे गर्मियों में पहनने से शरीर का तापमान कंट्रोल में रहता है।
  • आंखों और पीठ के लिए फायदेमंद: एक्यूप्रेशर के सिद्धांतों के अनुसार, इसकी बनावट ऐसी होती है जो चलते समय पैरों के खास पॉइंट्स को दबाती है, जिससे आंखों की रोशनी और पीठ के दर्द में आराम मिलता है।

जब इंटरनेशनल ब्रांडप्राडा‘ (Prada) ने मार ली थी पलटी!

आज कोल्हापुरी चप्पल सिर्फ भारत के गांवों या कस्बों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल रनवे और हॉलीवुड तक पहुंच चुकी है। मशहूर पॉप स्टार मडोना (Madonna) के पास भी अपनी खुद की कोल्हापुरी चप्पलों का कलेक्शन है!

हाल ही में, इंटरनेशनल लग्जरी ब्रांडप्राडाने अपने कलेक्शन में कोल्हापुरी डिज़ाइन से मिलतीजुलती सैंडल्स उतारी थीं, लेकिन उन्होंने भारत के इन कारीगरों को इसका क्रेडिट नहीं दिया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर खूब हंगामा हुआ, लोगों ने प्राडा को जमकर ट्रोल किया। आखिरकार, ब्रांड को माफी मांगनी पड़ी और भारतीय कारीगरों की इस कला का लोहा पूरी दुनिया ने माना। साल 2019 में इसे सरकार की तरफ से GI Tag (Geographical Indication) भी मिल चुका है, जो यह साबित करता है कि असली कोल्हापुरी सिर्फ महाराष्ट्र के खास जिलों में ही बन सकती है।

निष्कर्ष: हमारी विरासत, हमारा गर्व

तो दोस्तों, अगली बार जब आप कोल्हापुरी चप्पल पहनकर शीशे के सामने खड़े हों, तो मुस्कुराइएगा जरूर। क्योंकि आपके पैरों में सिर्फ एक फुटवियर नहीं, बल्कि 800 सालों का गौरवशाली इतिहास, राजामहाराजाओं की पसंद और हमारे देश के लोकल कारीगरों के हाथों का जादू है।वोकल फॉर लोकलबनिए और इस खूबसूरत भारतीय विरासत को हमेशा जिंदा रखिए!

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